॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.13
निशाचरीत्थं व्यथितस्तना व्यसु-
र्व्यादाय केशांश्चरणौ भुजावपि।
प्रसार्य गोष्ठे निजरूपमास्थिता
वज्राहतो वृत्र इवापतन्नृप॥ १३
niśācarītthaṃ vyathitastanā vyasu-
rvyādāya keśāṃścaraṇau bhujāvapi|
prasārya goṣṭhe nijarūpamāsthitā
vajrāhato vṛtra ivāpatannṛpa|| 13
अर्थ
परीक्षित्! इस प्रकार निशाचरी पूतनाके स्तनोंमें इतनी पीड़ा हुई कि वह अपनेको छिपा न सकी, राक्षसीरूपमें प्रकट हो गयी। उसके शरीरसे प्राण निकल गये, मुँह फट गया, बाल बिखर गये और हाथ-पाँव फैल गये। जैसे इन्द्रके वज्रसे घायल होकर वृत्रासुर गिर पड़ा था, वैसे ही वह बाहर गोष्ठमें आकर गिर पड़ी॥ १३॥