॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.7.59
प्रजाः पुपुषतुः प्रीतौ दम्पती पुत्रवत्सलौ।
शृण्वन्तौ कूजितं तासां निर्वृतौ कलभाषितैः॥ ५९
prajāḥ pupuṣatuḥ prītau dampatī putravatsalau|
śṛṇvantau kūjitaṃ tāsāṃ nirvṛtau kalabhāṣitaiḥ|| 59
अर्थ
अब उन कबूतर-कबूतरीकी आँखें अपने बच्चोंपर लग गयीं, वे बड़े प्रेम और आनन्दसे अपने बच्चोंका लालन-पालन, लाड़-प्यार करते और उनकी मीठी बोली, उनकी गुटर-गूँ सुन-सुनकर आनन्दमग्न हो जाते॥ ५९॥✎ 1820