श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.1.27

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

मेदःशिराः शिवस्कन्दो यज्ञश्रीस्तत्सुतस्ततः।

विजयस्तत्सुतो भाव्यश्‍चन्द्रविज्ञः सलोमधिः॥ २७

medaḥśirāḥ śivaskando yajñaśrīstatsutastataḥ|

vijayastatsuto bhāvyaścandravijñaḥ salomadhiḥ|| 27

अर्थ

पुरीमान्का मेदःशिरा, मेदःशिराका शिवस्कन्द, शिवस्कन्दका यज्ञश्री, यज्ञश्रीका विजय और विजयके दो पुत्र होंगे—चन्द्रविज्ञ और लोमधि॥ २७॥✎ 1780

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1780 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अनिष्ट-कर्मा, → अनिष्टकर्मा,

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