संतोंकी सभामें तभीतक दूसरे पुराणोंकी शोभा होती है, जबतक सर्वश्रेष्ठ स्वयं श्रीमद्भागवतमहापुराणके दर्शन नहीं होते॥ १४॥✎ 1457
राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे।
यावन्न दृश्यते साक्षाच्छ्रीमद्भागवतं परम्॥ १४
संतोंकी सभामें तभीतक दूसरे पुराणोंकी शोभा होती है, जबतक सर्वश्रेष्ठ स्वयं श्रीमद्भागवतमहापुराणके दर्शन नहीं होते॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.13.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 981) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/12/13/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1457 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): श्रीमद्भागवत-महापुराणके → श्रीमद्भागवतमहापुराणके