श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 13

23 श्लोक · एक-एक श्लोक पढ़ें →

मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 979–982

श्लोक-सूची
पृष्ठ 979

सूत उवाच

यं ब्रह्मा वरुणेन्द्ररुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै-

र्वेदैः सांगपदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः।

ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो

यस्यान्तं न विदुः सुरासुरगणा देवाय तस्मै नमः॥ १12.13.1

सूतजी कहते हैं—ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और मरुद्गण दिव्य स्तुतियोंके द्वारा जिनके गुण-गानमें संल‌ग्‍न रहते हैं; साम-संगीतके मर्मज्ञ ऋषि-मुनि अंग, पद, क्रम एवं उपनिषदोंके सहित वेदोंद्वारा जिनका गान करते रहते हैं; योगीलोग ध्यानके द्वारा निश्‍चल एवं तल्लीन मनसे जिनका भावमय दर्शन प्राप्त करते रहते हैं; किन्तु यह सब करते रहनेपर भी देवता, दैत्य, मनुष्य—कोई भी जिनके वास्तविक स्वरूपको पूर्णतया न जान सका, उन स्वयंप्रकाश परमात्माको नमस्कार है॥ १॥

पृष्ठे भ्राम्यदमन्दमन्दरगिरिग्रावाग्रकण्डूयना-

न्‍निद्रालोः कमठाकृतेर्भगवतः श्‍वासानिलाः पान्तु वः।

यत्संस्कारकलानुवर्तनवशाद् वेलानिभेनाम्भसां

यातायातमतन्द्रितं जलनिधेर्नाद्यापि विश्राम्यति॥ २12.13.2

जिस समय भगवान्‌ने कच्छपरूप धारण किया था और उनकी पीठपर बड़ा भारी मन्दराचल मथानीकी तरह घूम रहा था, उस समय मन्दराचलकी चट्टानोंकी नोकसे खुजलानेके कारण भगवान्‌को तनिक सुख मिला। वे सो गये और श्‍वासकी गति तनिक बढ़ गयी। उस समय उस श्‍वासवायुसे जो समुद्रके जलको धक्का लगा था, उसका संस्कार आज भी उसमें शेष है। आज भी समुद्र उसी श्‍वासवायुके थपेड़ोंके फलस्वरूप ज्वार-भाटोंके रूपमें दिन-रात चढ़ता-उतरता रहता है, उसे अबतक विश्राम न मिला। भगवान्‌की वही परमप्रभावशाली श्‍वासवायु आपलोगोंकी रक्षा करे॥ २॥

पृष्ठ 980

पुराणसंख्यासम्भूतिमस्य वाच्यप्रयोजने।

दानं दानस्य माहात्म्यं पाठादेश्‍च निबोधत॥ ३12.13.3

ब्राह्मं दशसहस्राणि पाद्मं पंचोनषष्टि च।

श्रीवैष्णवं त्रयोविंशच्चतुर्विंशति शैवकम्॥ ४12.13.4

दशाष्टौ श्रीभागवतं नारदं पंचविंशतिः।

मार्कण्डं नव वाह्नं च दशपंच चतुःशतम्॥ ५12.13.5

चतुर्दश भविष्यं स्यात्तथा पंचशतानि च।

दशाष्टौ ब्रह्मवैवर्तं लिंगमेकादशैव तु॥ ६12.13.6

चतुर्विंशति वाराहमेकाशीतिसहस्रकम्।

स्कान्दं शतं तथा चैकं वामनं दश कीर्तितम्॥ ७12.13.7

कौर्मं सप्तदशाख्यातं मात्स्यं तत्तु चतुर्दश।

एकोनविंशत्सौपर्णं ब्रह्माण्डं द्वादशैव तु॥ ८12.13.8

एवं पुराणसन्दोहश्‍चतुर्लक्ष उदाहृतः।

तत्राष्टादशसाहस्रं श्रीभागवतमिष्यते॥ ९12.13.9

पृष्ठ 980

शौनकजी! अब पुराणोंकी अलग-अलग श्‍लोक-संख्या, उनका जोड़, श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय और उसका प्रयोजन भी सुनिये। इसके दानकी पद्धति तथा दान और पाठ आदिकी महिमा भी आपलोग श्रवण कीजिये॥ ३॥ ब्रह्मपुराणमें दस हजार श्‍लोक, पद्मपुराणमें पचपन हजार, श्रीविष्णुपुराणमें तेईस हजार और शिवपुराणकी श्‍लोकसंख्या चौबीस हजार है॥ ४॥ श्रीमद्भागवतमें अठारह हजार, नारदपुराणमें पचीस हजार, मार्कण्डेयपुराणमें नौ हजार तथा अग्‍निपुराणमें पन्द्रह हजार चार सौ श्‍लोक हैं॥ ५॥ भविष्यपुराणकी श्‍लोक-संख्या चौदह हजार पाँच सौ है और ब्रह्मवैवर्तपुराणकी अठारह हजार तथा लिंगपुराणमें ग्यारह हजार श्‍लोक हैं॥ ६॥ वराहपुराणमें चौबीस हजार, स्कन्द-पुराणकी श्‍लोक-संख्या इक्यासी हजार एक सौ है और वामनपुराणकी दस हजार॥ ७॥ कूर्मपुराण सत्रह हजार श्‍लोकोंका और मत्स्यपुराण चौदह हजार श्‍लोकोंका है। गरुड़पुराणमें उन्‍नीस हजार श्‍लोक हैं और ब्रह्माण्डपुराणमें बारह हजार॥ ८॥ इस प्रकार सब पुराणोंकी श्‍लोकसंख्या कुल मिलाकर चार लाख होती है। उनमें श्रीमद्भागवत, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, अठारह हजार श्‍लोकोंका है॥ ९॥

इदं भगवता पूर्वं ब्रह्मणे नाभिपंकजे।

स्थिताय भवभीताय कारुण्यात् सम्प्रकाशितम्॥ १०12.13.10

शौनकजी! पहले-पहल भगवान् विष्णुने अपने नाभिकमलपर स्थित एवं संसारसे भयभीत ब्रह्मापर परम करुणा करके इस पुराणको प्रकाशित किया था॥ १०॥

आदिमध्यावसानेषु वैराग्याख्यानसंयुतम्।

हरिलीलाकथाव्रातामृतानन्दितसत्सुरम् ॥ ११12.13.11

इसके आदि, मध्य और अन्तमें वैराग्य उत्पन्‍न करनेवाली बहुत-सी कथाएँ हैं। इस महापुराणमें जो भगवान् श्रीहरिकी लीला-कथाएँ हैं, वे तो अमृतस्वरूप हैं ही; उनके सेवनसे सत्पुरुष और देवताओंको बड़ा ही आनन्द मिलता है॥ ११॥

सर्ववेदान्तसारं यद् ब्रह्मात्मैकत्वलक्षणम्।

वस्त्वद्वितीयं तन्‍निष्ठं कैवल्यैकप्रयोजनम्॥ १२12.13.12

आपलोग जानते हैं कि समस्त उपनिषदोंका सार है ब्रह्म और आत्माका एकत्वरूप अद्वितीय सद्वस्तु। वही श्रीमद्भागवतका प्रतिपाद्य विषय है। इसके निर्माणका प्रयोजन है एकमात्र कैवल्य-मोक्ष॥ १२॥

पृष्ठ 981

प्रौष्ठपद्यां पौर्णमास्यां हेमसिंहसमन्वितम्।

ददाति यो भागवतं स याति परमां गतिम्॥ १३ 12.13.13

राजन्ते तावदन्यानि पुराणानि सतां गणे।

यावन्‍न दृश्यते साक्षाच्छ्रीमद्भागवतं परम्॥ १४12.13.14

सर्ववेदान्तसारं हि श्रीभागवतमिष्यते।

तद्रसामृततृप्तस्य नान्यत्र स्याद्रतिः क्‍वचित्॥ १५ 12.13.15

निम्‍नगानां यथा गंगा देवानामच्युतो यथा।

वैष्णवानां यथा शम्भुः पुराणानामिदं तथा॥ १६ 12.13.16

क्षेत्राणां चैव सर्वेषां यथा काशी ह्यनुत्तमा।

तथा पुराणव्रातानां श्रीमद्भागवतं द्विजाः॥ १७ 12.13.17

श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं

यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।

तत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं

तच्छृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्‍नरः॥ १८ 12.13.18

पृष्ठ 981

जो पुरुष भाद्रपद मासकी पूर्णिमाके दिन श्रीमद्भागवतको सोनेके सिंहासनपर रखकर उसका दान करता है, उसे परमगति प्राप्त होती है॥ १३॥ संतोंकी सभामें तभीतक दूसरे पुराणोंकी शोभा होती है, जबतक सर्वश्रेष्ठ स्वयं श्रीमद्भागवतमहापुराणके दर्शन नहीं होते॥ १४॥ यह श्रीमद्भागवत समस्त उपनिषदोंका सार है। जो इस रस-सुधाका पान करके छक चुका है, वह किसी और पुराण-शास्त्रमें रम नहीं सकता॥ १५॥ जैसे नदियोंमें गंगा, देवताओंमें विष्णु और वैष्णवोंमें श्रीशंकरजी सर्वश्रेष्ठ हैं, वैसे ही पुराणोंमें श्रीमद्भागवत है॥ १६॥ शौनकादि ऋषियो! जैसे सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें काशी सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही पुराणोंमें श्रीमद्भागवतका स्थान सबसे ऊँचा है॥ १७॥ यह श्रीमद्भागवतपुराण सर्वथा निर्दोष है। भगवान्‌के प्यारे भक्त वैष्णव इससे बड़ा प्रेम करते हैं। इस पुराणमें जीवन्मुक्त परमहंसोंके सर्वश्रेष्ठ, अद्वितीय एवं मायाके लेशसे रहित ज्ञानका गान किया गया है। इस ग्रन्थकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि इसका नैष्कर्म्य अर्थात् कर्मोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति भी ज्ञान-वैराग्य एवं भक्तिसे युक्त है। जो इसका श्रवण, पठन और मनन करने लगता है, उसे भगवान्‌की भक्ति प्राप्त हो जाती है और वह मुक्त हो जाता है॥ १८॥✎ 1457

कस्मै येन विभासितोऽयमतुलो ज्ञानप्रदीपः पुरा

तद्रूपेण च नारदाय मुनये कृष्णाय तद्रूपिणा।

योगीन्द्राय तदात्मनाथ भगवद्राताय कारुण्यत-

स्तच्छुद्धं विमलं विशोकममृतं सत्यं परं धीमहि॥ १९12.13.19

यह श्रीमद्भागवत भगवत्तत्त्वज्ञानका एक श्रेष्ठ प्रकाशक है। इसकी तुलनामें और कोई भी पुराण नहीं है। इसे पहले-पहल स्वयं भगवान् नारायणने ब्रह्माजीके लिये प्रकट किया था। फिर उन्होंने ही ब्रह्माजीके रूपसे देवर्षि नारदको उपदेश किया और नारदजीके रूपसे भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासको। तदनन्तर उन्होंने ही व्यासरूपसे योगीन्द्र शुकदेवजीको और श्रीशुकदेवजीके रूपसे अत्यन्त करुणावश राजर्षि परीक्षित‍्को उपदेश किया। वे भगवान् परम शुद्ध एवं मायामलसे रहित हैं। शोक और मृत्यु उनके पासतक नहीं फटक सकते। हम सब उन्हीं परम सत्यस्वरूप परमेश्‍वरका ध्यान करते हैं॥ १९॥ ✎ 1458

पृष्ठ 982

नमस्तस्मै भगवते वासुदेवाय साक्षिणे।

य इदं कृपया कस्मै व्याचचक्षे मुमुक्षवे॥ २० 12.13.20

योगीन्द्राय नमस्तस्मै शुकाय ब्रह्मरूपिणे।

संसारसर्पदष्टं यो विष्णुरातममूमुचत्॥ २१12.13.21

पृष्ठ 982

हम उन सर्वसाक्षी भगवान् वासुदेवको नमस्कार करते हैं, जिन्होंने कृपा करके मोक्षाभिलाषी ब्रह्माजीको इस श्रीमद्भागवतमहापुराणका उपदेश किया॥ २०॥ साथ ही हम उन योगिराज ब्रह्मस्वरूप श्रीशुकदेवजीको भी नमस्कार करते हैं, जिन्होंने श्रीमद्भागवतमहापुराण सुनाकर संसार-सर्पसे डसे हुए राजर्षि परीक्षित‍्को मुक्त किया॥ २१॥ ✎ 1459

भवे भवे यथा भक्तिः पादयोस्तव जायते।

तथा कुरुष्व देवेश नाथस्त्वं नो यतः प्रभो॥ २२12.13.22

देवताओंके आराध्यदेव सर्वेश्‍वर! आप ही हमारे एकमात्र स्वामी एवं सर्वस्व हैं। अब आप ऐसी कृपा कीजिये कि बार-बार जन्म ग्रहण करते रहनेपर भी आपके चरणकमलोंमें हमारी अविचल भक्ति बनी रहे॥ २२॥

नामसंकीर्तनं यस्य सर्वपापप्रणाशनम्।

प्रणामो दुःखशमनस्तं नमामि हरिं परम्॥ २३12.13.23

जिन भगवान्‌के नामोंका संकीर्तन सारे पापोंको सर्वथा नष्ट कर देता है और जिन भगवान्‌के चरणोंमें आत्मसमर्पण, उनके चरणोंमें प्रणति सर्वदाके लिये सब प्रकारके दुःखोंको शान्त कर देती है, उन्हीं परमतत्त्वस्वरूप श्रीहरिको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २३॥✎ 1789

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां
संहितायां द्वादशस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः॥ १३॥

इति द्वादशः स्कन्धः समाप्तः
सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये।

तेन त्वदङ्‌घ्रिकमले रतिं मे यच्छ शाश्‍वतीम्॥

हे गोविन्द! आपकी वस्तु आपको ही समर्पण कर रहा हूँ। इसके द्वारा आपके चरणकमलोंमें मुझे शाश्‍वत प्रेम प्रदान करनेकी कृपा करें।

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें