॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.13.18
श्रीमद्भागवतं पुराणममलं यद्वैष्णवानां प्रियं
यस्मिन् पारमहंस्यमेकममलं ज्ञानं परं गीयते।
तत्र ज्ञानविरागभक्तिसहितं नैष्कर्म्यमाविष्कृतं
तच्छृण्वन् विपठन् विचारणपरो भक्त्या विमुच्येन्नरः॥ १८
śrīmadbhāgavataṃ purāṇamamalaṃ yadvaiṣṇavānāṃ priyaṃ
yasmin pāramahaṃsyamekamamalaṃ jñānaṃ paraṃ gīyate|
tatra jñānavirāgabhaktisahitaṃ naiṣkarmyamāviṣkṛtaṃ
tacchṛṇvan vipaṭhan vicāraṇaparo bhaktyā vimucyennaraḥ|| 18
अर्थ
यह श्रीमद्भागवतपुराण सर्वथा निर्दोष है। भगवान्के प्यारे भक्त वैष्णव इससे बड़ा प्रेम करते हैं। इस पुराणमें जीवन्मुक्त परमहंसोंके सर्वश्रेष्ठ, अद्वितीय एवं मायाके लेशसे रहित ज्ञानका गान किया गया है। इस ग्रन्थकी सबसे बड़ी विलक्षणता यह है कि इसका नैष्कर्म्य अर्थात् कर्मोंकी आत्यन्तिक निवृत्ति भी ज्ञान-वैराग्य एवं भक्तिसे युक्त है। जो इसका श्रवण, पठन और मनन करने लगता है, उसे भगवान्की भक्ति प्राप्त हो जाती है और वह मुक्त हो जाता है॥ १८॥✎ 1457