श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.2.37

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

देवापिः शन्तनोर्भ्राता मरुश्‍चेक्ष्वाकुवंशजः।

कलापग्राम आसाते महायोगबलान्वितौ॥ ३७

devāpiḥ śantanorbhrātā maruścekṣvākuvaṃśajaḥ|

kalāpagrāma āsāte mahāyogabalānvitau|| 37

अर्थ

भीष्मपितामहके पिता राजा शन्तनुके भाई देवापि और इक्ष्वाकुवंशी मरु इस समय कलाप-ग्राममें स्थित हैं। वे बहुत बड़े योगबलसे युक्त हैं॥ ३७॥

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