॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.2.41
कृमिविड्भस्मसंज्ञान्ते राजनाम्नोऽपि यस्य च।
भूतध्रुक् तत्कृते स्वार्थं किं वेद निरयो यतः॥ ४१
kṛmiviḍbhasmasaṃjñānte rājanāmno'pi yasya ca|
bhūtadhruk tatkṛte svārthaṃ kiṃ veda nirayo yataḥ|| 41
अर्थ
इस शरीरको भले ही कोई राजा कह ले; परन्तु अन्तमें यह कीड़ा, विष्ठा अथवा राखके रूपमें ही परिणत होगा, राख ही होकर रहेगा। इसी शरीरके या इसके सम्बन्धियोंके लिये जो किसी भी प्राणीको सताता है, वह न तो अपना स्वार्थ जानता है और न तो परमार्थ। क्योंकि प्राणियोंको सताना तो नरकका द्वार है॥ ४१॥