श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.23

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

हुत्वाग्‍निं समुपासीनं ददृशुः शक्रकिंकराः।

मीलिताक्षं दुराधर्षं मूर्तिमन्तमिवानलम्॥ २३

hutvāgniṃ samupāsīnaṃ dadṛśuḥ śakrakiṃkarāḥ|

mīlitākṣaṃ durādharṣaṃ mūrtimantamivānalam|| 23

अर्थ

उस समय मार्कण्डेय मुनि अग्‍निहोत्र करके भगवान्‌की उपासना कर रहे थे। उनके नेत्र बंद थे। वे इतने तेजस्वी थे, मानो स्वयं अग्‍निदेव ही मूर्तिमान् होकर बैठे हों! उनको देखनेसे ही मालूम हो जाता था कि इनको पराजित कर सकना बहुत ही कठिन है। इन्द्रके आज्ञाकारी सेवकोंने मार्कण्डेय मुनिको इसी अवस्थामें देखा॥ २३॥

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