श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.2.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

दृष्टा भवद्भिर्ननु राजसूये

चैद्यस्य कृष्णं द्विषतोऽपि सिद्धिः।

यां योगिनः संस्पृहयन्ति सम्यग्

योगेन कस्तद्विरहं सहेत॥ १९

dṛṣṭā bhavadbhirnanu rājasūye

caidyasya kṛṣṇaṃ dviṣato'pi siddhiḥ|

yāṃ yoginaḥ saṃspṛhayanti samyag

yogena kastadvirahaṃ saheta|| 19

अर्थ

आपलोगोंने राजसूय यज्ञमें प्रत्यक्ष ही देखा था कि श्रीकृष्णसे द्वेष करनेवाले शिशुपालको वह सिद्धि मिल गयी, जिसकी बड़े-बड़े योगी भलीभाँति योग-साधना करके स्पृहा करते रहते हैं। उनका विरह भला कौन सह सकता है॥ १९॥✎ 194 1297 1298

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #194 शब्दोंके बीचका स्थान: जाना—भगवान् की → जाना—भगवान्‌की
  • #1297 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रकुटिविलाससे → भु्रुकुटिविलाससे
  • #1298 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): भु्रुकुटिविलाससे → भ्रुकुटिविलाससे

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