श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.5.21

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

भवान् भगवतो नित्यं सम्मतः सानुगस्य च।

यस्य ज्ञानोपदेशाय माऽऽदिशद्भगवान् व्रजन्॥ २१

bhavān bhagavato nityaṃ sammataḥ sānugasya ca|

yasya jñānopadeśāya mā''diśadbhagavān vrajan|| 21

अर्थ

आप सर्वदा ही श्रीभगवान् और उनके भक्तोंको अत्यन्त प्रिय हैं; इसीलिये भगवान् निजधाम पधारते समय मुझे आपको ज्ञानोपदेश करनेकी आज्ञा दे गये हैं॥ २१॥✎ 210 211

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #210 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #211 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् में → श्रीभगवान्‌में

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