श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.1.44

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आयतिं नियतिं चैव सुते मेरुस्तयोरदात्।

ताभ्यां तयोरभवतां मृकण्डः प्राण एव च॥ ४४

āyatiṃ niyatiṃ caiva sute merustayoradāt|

tābhyāṃ tayorabhavatāṃ mṛkaṇḍaḥ prāṇa eva ca|| 44

अर्थ

मेरुऋषिने अपनी आयति और नियति नामकी कन्याएँ क्रमशः धाता और विधाताको ब्याहीं; उनसे उनके मृकण्ड और प्राण नामक पुत्र हुए॥ ४४॥

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