तब ऋत्विजोंने विस्मित होकर यजमान अंगसे कहा—‘राजन्! हम आहुतियोंके रूपमें आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवतालोग स्वीकार नहीं करते॥ २६॥
तमूचुर्विस्मितास्तत्र यजमानमथर्त्विजः।
हवींषि हूयमानानि न ते गृह्णन्ति देवताः॥ २६
तब ऋत्विजोंने विस्मित होकर यजमान अंगसे कहा—‘राजन्! हम आहुतियोंके रूपमें आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवतालोग स्वीकार नहीं करते॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 475) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/26/