वह दुष्ट वेन धनुष-बाण चढ़ाकर वनमें जाता और व्याधके समान बेचारे भोले-भाले हरिणोंकी हत्या करता। उसे देखते ही पुरवासीलोग ‘वेन आया! वेन आया!’ कहकर पुकार उठते॥ ४०॥
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः।
हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः॥ ४०
वह दुष्ट वेन धनुष-बाण चढ़ाकर वनमें जाता और व्याधके समान बेचारे भोले-भाले हरिणोंकी हत्या करता। उसे देखते ही पुरवासीलोग ‘वेन आया! वेन आया!’ कहकर पुकार उठते॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 477) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/13/40/