श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.18.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

ततो महीपतिः प्रीतः सर्वकामदुघां पृथुः।

दुहितृत्वे चकारेमां प्रेम्णा दुहितृवत्सलः॥ २८

tato mahīpatiḥ prītaḥ sarvakāmadughāṃ pṛthuḥ|

duhitṛtve cakāremāṃ premṇā duhitṛvatsalaḥ|| 28

अर्थ

इससे महाराज पृथु ऐसे प्रसन्‍न हुए कि सर्वकामदुहा पृथ्वीके प्रति उनका पुत्रीके समान स्नेह हो गया और उसे उन्होंने अपनी कन्याके रूपमें स्वीकार कर लिया॥ २८॥

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