॥ श्रीहरिः ॥
तत्रापि हंसं पुरुषं परमात्मानमात्मदृक्।
यजंस्तल्लोकतामाप कुशलेन समाधिना॥ ७
tatrāpi haṃsaṃ puruṣaṃ paramātmānamātmadṛk|
yajaṃstallokatāmāpa kuśalena samādhinā|| 7
अर्थ
यज्ञकार्यमें लगे रहनेपर भी उन आत्मज्ञानी राजाने भक्तभयभंजन पूर्णतम परमात्माकी आराधना करके सुदृढ़ समाधिके द्वारा भगवान्के दिव्य लोकको प्राप्त किया॥ ७॥
तत्रापि हंसं पुरुषं परमात्मानमात्मदृक्।
यजंस्तल्लोकतामाप कुशलेन समाधिना॥ ७
यज्ञकार्यमें लगे रहनेपर भी उन आत्मज्ञानी राजाने भक्तभयभंजन पूर्णतम परमात्माकी आराधना करके सुदृढ़ समाधिके द्वारा भगवान्के दिव्य लोकको प्राप्त किया॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.24.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 524) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/24/7/