मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। इसपर उसने अत्यन्त कुपित होकर मुझे यह दुःसह शाप दिया कि ‘तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, अतः तुम एक स्थानपर अधिक देर न ठहर सकोगे’॥ २२॥
मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम्।
स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने॥ २२
मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। इसपर उसने अत्यन्त कुपित होकर मुझे यह दुःसह शाप दिया कि ‘तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, अतः तुम एक स्थानपर अधिक देर न ठहर सकोगे’॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.27.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 545) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/27/22/