श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.27.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम्।

स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्ञाविमुखो मुने॥ २२

mayi saṃrabhya vipulamadācchāpaṃ suduḥsaham|

sthātumarhasi naikatra madyācñāvimukho mune|| 22

अर्थ

मैंने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। इसपर उसने अत्यन्त कुपित होकर मुझे यह दुःसह शाप दिया कि ‘तुमने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की, अतः तुम एक स्थानपर अधिक देर न ठहर सकोगे’॥ २२॥

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