॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.27.7
दुहितॄर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः।✎ 1036
शीलौदार्यगुणोपेताः पौरंजन्यः प्रजापते॥ ७
duhitṝrdaśottaraśataṃ pitṛmātṛyaśaskarīḥ|
śīlaudāryaguṇopetāḥ pauraṃjanyaḥ prajāpate|| 7
अर्थ
प्रजापते! उस पुरंजनीसे राजा पुरंजनके ग्यारह सौ पुत्र और एक सौ दस कन्याएँ हुईं, जो सभी माता-पिताका सुयश बढ़ानेवाली और सुशीलता, उदारता आदि गुणोंसे सम्पन्न थीं। ये पौरंजनी नामसे विख्यात हुईं। इतनेमें ही उस सम्राट्की लंबी आयुका आधा भाग निकल गया॥ ६-७॥