श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.1.5

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आकूत्यां देवहूत्यां च८ दुहित्रोस्तस्य वै मनोः।

ध९र्मज्ञानोपदेशार्थं भगवान्पुत्रतां गतः॥ ५

ākūtyāṃ devahūtyāṃ ca duhitrostasya vai manoḥ|

dharmajñānopadeśārthaṃ bhagavānputratāṃ gataḥ|| 5

अर्थ

स्वायम्भुव मनुकी पुत्री आकूतिसे यज्ञपुरुषके रूपमें धर्मका उपदेश करनेके लिये तथा देवहूतिसे कपिलके रूपमें ज्ञानका उपदेश करनेके लिये भगवान्‌ने उनके पुत्ररूपसे अवतार ग्रहण किया था॥ ५॥✎ 649

टिप्पणियाँ

  1. ८

    प्रा० पा०—नु।

    (मुद्रित पृष्ठ 905)
  2. ९

    प्राचीन प्रतिमें ‘धर्मज्ञानोपदेशार्थं...’ से लेकर ‘...कपिलस्यानुवर्णितम्’ यहाँतकका पाठ इस प्रकार है—‘उत्पत्तिः सर्वजन्तूनां वर्णिता पुरुषर्षभ। चरितं पुण्यकीर्तेश्‍च कपिलस्यानुवर्णितम्॥’

    (मुद्रित पृष्ठ 905)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #649 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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