श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.16.33

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

नमो हिरण्यगर्भाय प्राणाय१ जगदात्मने।

योगैश्‍वर्यशरीराय नमस्ते योगहेतवे॥ ३३

namo hiraṇyagarbhāya prāṇāya jagadātmane|

yogaiśvaryaśarīrāya namaste yogahetave|| 33

अर्थ

आप ही सबके प्राण और आप ही इस जगत‍्के स्वरूप भी हैं। आप योगके कारण तो हैं ही स्वयं योग और उससे मिलनेवाला ऐश्‍वर्य भी आप ही हैं। हे हिरण्यगर्भ! आपके लिये मेरे नमस्कार॥ ३३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—देवाय।

    (मुद्रित पृष्ठ 982)

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