श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.21.28

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

तं बद्धं वारुणैः पाशैर्भगवानाह वामनः।

नष्टश्रियं स्थिरप्रज्ञमुदारयशसं नृप॥ २८

taṃ baddhaṃ vāruṇaiḥ pāśairbhagavānāha vāmanaḥ|

naṣṭaśriyaṃ sthiraprajñamudārayaśasaṃ nṛpa|| 28

अर्थ

यद्यपि बलि वरुणके पाशोंसे बँधे हुए थे, उनकी सम्पत्ति भी उनके हाथोंसे निकल गयी थी—फिर भी उनकी बुद्धि निश्‍चयात्मक थी और सब लोग उनके उदार यशका गान कर रहे थे। परीक्षित्! उस समय भगवान्‌ने बलिसे कहा॥ २८॥✎ 810

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #810 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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