॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 8.22.20
विन्ध्यावलिरुवाच
क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते
स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः।
कर्तुः प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति
त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥ २०✎ 1123
krīḍārthamātmana idaṃ trijagat kṛtaṃ te
svāmyaṃ tu tatra kudhiyo'para īśa kuryuḥ|
kartuḥ prabhostava kimasyata āvahanti
tyaktahriyastvadavaropitakartṛvādāḥ || 20
अर्थ
विन्ध्यावलीने कहा—प्रभो! आपने अपनी क्रीडाके लिये ही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना की है। जो लोग कुबुद्धि हैं, वे ही अपनेको इसका स्वामी मानते हैं। जब आप ही इसके कर्ता, भर्ता और संहर्ता हैं, तब आपकी मायासे मोहित होकर अपनेको झूठमूठ कर्ता माननेवाले निर्लज्ज आपको समर्पण क्या करेंगे?॥ २०॥