श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 8.24.35

अष्टम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

आरुह्य बृहतीं नावं विचरिष्यस्यविक्लवः।

एकार्णवे निरालोके ऋषीणामेव वर्चसा॥ ३५

āruhya bṛhatīṃ nāvaṃ vicariṣyasyaviklavaḥ|

ekārṇave nirāloke ṛṣīṇāmeva varcasā|| 35

अर्थ

उस समय सब ओर एकमात्र महासागर लहराता होगा। प्रकाश नहीं होगा। केवल ऋषियोंकी दिव्य ज्योतिके सहारे ही बिना किसी प्रकारकी विकलताके तुम उस बड़ी नावपर चढ़कर चारों ओर विचरण करना॥ ३५॥

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