इसके बाद अमृतका कलश हाथमें लेकर भगवान् दैत्योंके पास चले गये। उन्हें हाव-भाव और कटाक्षसे मोहित करके दूर बैठे हुए देवताओंके पास आ गये तथा उन्हें वह अमृत पिलाने लगे, जिसे पी लेनेपर बुढ़ापे और मृत्युका नाश हो जाता है॥ २१॥✎ 719720
दैत्यान्गृहीतकलशो वञ्चयन्नुपसञ्चरैः।
दूरस्थान् पाययामास जरामृत्युहरां सुधाम्॥ २१
इसके बाद अमृतका कलश हाथमें लेकर भगवान् दैत्योंके पास चले गये। उन्हें हाव-भाव और कटाक्षसे मोहित करके दूर बैठे हुए देवताओंके पास आ गये तथा उन्हें वह अमृत पिलाने लगे, जिसे पी लेनेपर बुढ़ापे और मृत्युका नाश हो जाता है॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 949) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/9/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)