परीक्षित्! असुर अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन कर रहे थे। उनका स्नेह भी हो गया था और वे स्त्रीसे झगड़नेमें अपनी निन्दा भी समझते थे। इसलिये वे चुपचाप बैठे रहे॥ २२॥
ते पालयन्तः समयमसुराः स्वकृतं नृप।
तूष्णीमासन्कृतस्नेहाः स्त्रीविवादजुगुप्सया॥ २२
परीक्षित्! असुर अपनी की हुई प्रतिज्ञाका पालन कर रहे थे। उनका स्नेह भी हो गया था और वे स्त्रीसे झगड़नेमें अपनी निन्दा भी समझते थे। इसलिये वे चुपचाप बैठे रहे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 8.9.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 950) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/8/9/22/