उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें एक वनसे दूसरे वनमें होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मीके तापसे व्याकुल हो गयीं। वे बेसुध-सी होकर अन्तमें डकराती हुई मुंजाटवी (सरकंडोंके वन) में घुस गयीं॥ २॥✎ 1816
अजा गावो महिष्यश्च निर्विशन्त्यो वनाद् वनम्।
इषीकाटवीं निर्विविशुः क्रन्दन्त्यो दावतर्षिताः॥ २
उनकी बकरियाँ, गायें और भैंसें एक वनसे दूसरे वनमें होती हुई आगे बढ़ गयीं तथा गर्मीके तापसे व्याकुल हो गयीं। वे बेसुध-सी होकर अन्तमें डकराती हुई मुंजाटवी (सरकंडोंके वन) में घुस गयीं॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.19.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 256) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/19/2/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1816 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): हरी हरी → हरी-हरी