तृणावर्त नामका एक दैत्य था। वह कंसका निजी सेवक था। कंसकी प्रेरणासे ही बवंडरके रूपमें वह गोकुलमें आया और बैठे हुए बालक श्रीकृष्णको उड़ाकर आकाशमें ले गया॥ २०॥
दैत्यो नाम्ना तृणावर्तः कंसभृत्यः प्रणोदितः।
चक्रवातस्वरूपेण जहारासीनमर्भकम्॥ २०
तृणावर्त नामका एक दैत्य था। वह कंसका निजी सेवक था। कंसकी प्रेरणासे ही बवंडरके रूपमें वह गोकुलमें आया और बैठे हुए बालक श्रीकृष्णको उड़ाकर आकाशमें ले गया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 164) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/7/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1879 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): प्रणोदित्रः → प्रणोदितः